मन्दिर और तीर्थ में क्यों जाएं?

1. मन्दिर में क्यों जाएं?

2. मन्दिर में कैसे जाएं-क्यां भेंट करें?

3. तीर्थ यात्रा क्यों करें?

4. तीर्थ यात्रा कैसे करें?

5. तीर्थ यात्रा करते समय

6. तीर्थ स्नान कैसे करें? 

 

1. मन्दिर में क्यों जाएं?

जब कण-कण में प्रभु व्याप्त हैं। हर वस्तु में जीव में उनका वास है, यह शास्त्रों में वर्णित है। तब मन्दिर में दर्शन करने कोई क्यों जावे, ऐसा भाव कवचित् साधुजनों का भी रहता है। नास्तिक जन तो प्रभु को वैसे ही नकारते हैं, उनकी तो बात ही नहीं है। यद्यपि यह कथन अनुचित नहीं है फिर भी एकाग्रमना होकर जब आप चिन्तन करेंगे-तब पाएंगे यह अकथनीय अवर्णनीय संसार पांच तत्वों से व्याप्त है। जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि और आकाश। इन्हीं पांच तत्वों के मिश्रण से जड़-चेतन सृष्टि का निर्माण हुआ है ऐसा शास्त्रों द्वारा भी प्रतिपादित है, ऐसा देखा भी जाता है। एक अकेले वायु में ही कई प्रकार के तत्व मिश्रित हैं। वे वायवीय तत्व हमारे नासिका, मुख, कान इत्यादि छिद्रों से निरन्तर गतिशील होते हुए हम जीवों के उदर में प्रवेश करते हैं। हमारा उदर उन तत्वों में से प्राण वायु (आक्सीजन) को ग्रहण कर शेष को इन्हीं छिद्रों से बाहर निकाल देता है। इस कथन का अभिप्राय यह है जिस किसी ने भी हम जीवों का निर्माण किया उसे चाहे परमात्मा का नाम दो या उसे कोई नाम दो या न दो- हमारे शरीर को इस क्रिया में गतिशील किया है जो कि वह – ‘सार सार को गहि रहयो थोथा देओ उडाय’ पर चलता है। हम चाहे अनचाहे भी प्राण वायु को स्वीकार करते हैं और अन्य वायवीय तत्वों को बाहर निकाल देते हैं- इसके लिए हमें जरा सा भी प्रयास नहीं करना पड़ता। यह तो रही हमारे शरीर की बात।

शरीर के भीतर उस से विलग होकर भी जिन दो तत्वों का वास है उनमें एक है मन दूसरा तत्व है आत्मा। यह शरीर में कहां रहते हैं- इस की खोज में न जाकर सभी मानव इस को स्वीकार करते हैं- जिस प्रकार प्राणवायु हमें दिखाई नहीं देता केवल अनुभव होता है। उसी प्रकार ये दोनों तत्व यद्यपि शरीर में दिखायी नहीं देते परन्तु प्रतिभासित होते हैं। ऐसा शास्त्रों में भी वर्णित है। इन तीनों को देह को-मन को-आत्मा को-भूख भी लगती है। देह को भोजन की आवश्यकता होती है- मन को वासना की भूख रहती है और आत्मा की सुख आनन्द के बिना तृप्ति नहीं होती।शरीर को भूख लगती है तब हम भोजन अपने उदर में डालते हैं मन में नित्य नई-नई वासनाओं की आपाधापी रहती है तो उन वासनाओं की तृप्ति के लिए मन चाहा करते हैं; किन्तु आत्मा को हम परमात्मा का अंश करके जानते हैं- परमात्मा सर्वदा चिन्मय आन्नद में रमण करने वाले माने गए हैं। अतएव आत्मा भी उस आनन्द को प्राप्त करने के लिए सर्वदा लालायित रहता है उसी आत्मिक आनन्द प्राप्ति के हेतु हम भगवान का भजन पूजन स्तुति गायन करते हैं। जहां देह मन की बुभुक्षा भौतिक पदार्थो द्वारा हरण होती हैं- वहां आत्मा की भूख तो प्रभु भजन पूजन स्तुति द्वारा ही तृप्त होती है भगवान् जो हैं- वे भाव प्रिय हैं उन्हे कोई वस्तु कोई पदार्थ लुभा नहीं पाता। वे केवल सद्भाव प्रियभाव भक्तिभाव द्वारा ही तृप्त होते हैं। उन्हीं भगवान की अंश रूप जीवों की आत्मा होती है – जो केवल प्रभु से प्रीति द्वारा ही तृप्त होती है और उन श्री प्रभु की प्रीति उनकी छवि के दर्शन करने, उनकी छवि का चिन्तन करने से ही वृद्धि को प्राप्त होती है।

यद्यपि यह सत्य है- सनातन विचारधारा के सभी प्राणियों में प्रभु के प्रति निष्ठा होने के कारण लगभग सभी के घरों में द्वारों में किसी न किसी एक कोने में भगवान का श्री विग्रह व चित्र अवश्य ही स्थापित होता है। जहां गृहवासी एकत्र हो प्रभु के प्रति श्रद्धा विनत हो उनका पूजन गायन करते हैं- जिन से गृहवासियों को कुछ काल के लिए ही सही आनन्द की विशेष अनुभूति प्राप्त होती है। किन्तु भावप्रिय भगवान के मन्दिरों में जाकर उनके दर्शन से-अनेक जनों की भावप्रियता से भाव विह्वलता से घनीभूत जो वातावरण बना होता है वह निज गृहों में प्राप्त नहीं होता। विशेषकर प्रभु के प्रकट स्थानों में जो विचित्र आनन्द की शान्ति की प्राप्ति होती है- वह अन्यत्र प्राप्त नहीं होती। अतः जिस प्रकार हमारी देह केवल प्राणवायु को ही भीतर रखती है जिससे शरीर गतिमान रहता है उसी प्रकार हमारी आत्मा मन्दिर में जाकर श्री विग्रह के सामने स्थित हो अत्यन्त सुखद आनन्द को प्राप्त करती है।

मन्दिर में जाकर हमारे मन की चंचलता विनष्ट हो जाती है- मन एकाग्रचित हो जाता है व भक्तिमय हो जाता है। भक्ति प्रेम का ही दूसरा रूप है। बिना जान पहचाने प्रीति नहीं होती। प्रीति से श्रद्धा विश्वास उत्पन्न होता है। विश्वास से संकल्प की दृढ़ता उत्पन्न होती है और संकल्प शक्ति ही सफलता का मूलमन्त्र है। 

मन्दिर में श्री विग्रह हमारे भगवान का ही प्रतिरूप होता है- इसलिए भगवान् से पहचान् कराने का मन्दिर ही एकमात्र स्थान होता है।


2. मन्दिर में कैसे जाएं-क्यां भेंट करें ?

मन्दिर में जब भी जाएं, हड़बड़ता में मत जाएं। पूर्ण धीरज संयम सन्तोष से मन्दिर में नंगे पांव जाएं। पंक्तिबद्ध होकर दर्शन करें।

आपके भाव सरल हों – पहराव सरल हों। अटपटा पहराव न पहने जिस से अन्य भक्तजनों के मन में चंचलता का उदय हो और आप सबकी तीखी नज़रों से वेधित होते रहें। सभी प्रकार की शान शौकत व अंहकार मन्दिर के बाहर ही त्याग दें।

श्री विग्रह के सामने जाकर उनकी छवि को नख से शिख तक निहारें उस छवि को अपने हृदय में आत्मसात् करें- बार बार निहारें किन्तु श्री विग्रह की आंखों में बार-बार न झांके।

श्री विग्रह के सामने खुले बालों में न जावे न ही उनके सामने जाकर बालों को ठीक करें।

उनके ठीक सामने खड़े न होकर कुछ हटकर खड़े हो।

दूसरे भक्तों को भी दर्शन करने का सौभाग्य प्रदान करें । 

श्री विग्रह के सामने आंखे बंद न करें उनके दर्शन निरन्तर करते रहें।

भगवान तो भावप्रिय हैं उन्हे किसी भेंट की आवश्यकता नहीं होती फिर भी पुष्प माला इत्यादि यदि भेंट करना चाहें तो करें यदि कोई मिष्ठान या फल भेंट करना चाहते हैं तो करें उसे उनका कृपा प्रसाद समझकर ग्रहण करें।

कतिपय मन्दिरों में बाहर से लायी कोई भी वस्तु स्वीकार नही की जाती, मंदिरों में बने पदार्थ ही भेंट किएँ जाते हैं।

भगवान को नारियल की भेंट अतिप्रिय होती है प्रयास कर ऐसी भेंट ही प्रदान करनी चाहिए। 

गणेश जी को दुर्वादल शंकर जी को विल्व पत्र विष्णु जी को तुलसीदल हनुमान जी को गेन्दा शक्ति को गेंदा अधिक प्रिय है – इसलिए इन्हें इसी प्रकार के पुष्प पत्र भेंट करने का प्रयास करें। कमल पुष्प सभी देव-देवियों का प्रिय पुष्प है जिससे उन्हे परम प्रसन्नता प्राप्त होती है।

भगवान को जो भी वस्तु सरलता से भेंट कर सके, वही करें। भगवान तो भाव के भूखे हैं प्रशाद के नहीं– अतएव उनके चरणों में पुष्प निवेदन करें, यह सब से बेहतर है। 


3. तीर्थ यात्रा क्यों करें ?

मनुष्य जीवन का परम और एकमात्र उद्देश्य है- भगवत्प्राप्ति। कोई भी प्राणी चाहे वृद्ध हो या युवक चाहे वह बाल ही क्यों न हो। सदा सर्वदा काल के गाल में रहता है। कब किसकी मृत्यु आ जाए यह कोई भी नहीं जानता, न ही कोई किसी भी प्रकार से उस मृत्यु को टाल सकता है। इस बात को हृदय में धारण कर संसार को असत्य जानकर, जो व्यक्ति यह ज्ञान प्राप्त कर लेता है कि अन्तत तो ईश्वर शरणागति के सिवा और कोई चारा नहीं। वह भगवान के कीर्तन भजन पूजन की ओर उन्मुख हो जाता है। भगवान के स्वरूप गुण लीला का ज्ञान प्राप्त करने के लिए वह पाप रहित होकर भगवत्प्राप्ति के हेतु ज्ञानमयी ग्रन्थों का अध्ययन करता है। सत्संगत प्राप्त करने के हेतु सच्चे साधुओं की खोज में प्रवृत होकर उनकी संगति में वास करता है।

सच्चा साधु वह है – जिसकी न तो किसी पदार्थ में, न किसी कामना में न इहलोक – परलोक में आसक्ति हो। वह निर्द्व्न्द- द्वेष रहित- पाप रहित अनासक्त निर्लोभी हो। ऐसे साधुजन मन से भी धन व स्त्री से संबन्ध नहीं रखते। वे जो उपदेश देते है- वह सारगर्मित, सम्मोह का नाशक मन के सभी संशयों को भ्रमों को नाश करने वाला भगवान की भक्ति और प्रीति को बढ़ाने वाला होता है। ऐसे साधुजनों के दर्शन मात्र से जीव की पाप राशि दग्धता को प्राप्त हो जाती है।

ऐसे साधुजन प्रभु कृपावशात् तीर्थों में प्राप्त होते हैं– अतएव उनके दर्शन के लिए तीर्थों में जाना चाहिए। जहाँ उनके सहवास में रहकर कुछ काल व्यतीत करना चाहिए वैसे भी गंगा जमुना आदि पवित्र नदियों में स्नान मात्र करने से ही आत्मिक संतोष तथा पुण्य लाभ प्राप्त होता है- ऐसा शास्त्रों में भी वर्णन है। हमारे अवतारी पुरूषों ने भी अपने जीवन काल में पवित्र पुण्यशाली तीर्थों में जाकर पुण्य प्राप्त किया है। ऐसे वर्णनों से हमारे पुराणादि पवित्र ग्रन्थ भरे पड़े हैं। अतएव तीर्थ यात्रा को अवश्य जाना चाहिए।


4. तीर्थ यात्रा कैसे करें ?

तीर्थ यात्रा का निश्चय करके मन भगवान् में लगा देना चाहिए। यात्रा काल में प्रभु नाम का स्मरण चलते रहना चाहिए। पूरी सादगी स्वच्छता से रहना चाहिए। अपने हेतु धन, मान, बड़ाई, सत्कार, आदर, पूजा आदि भावों का त्याग कर देना चाहिए। 


 

5. तीर्थ यात्रा करते समय –

दूसरों की सुविधा, सम्मान, आराम, अधिकार का ध्यान रखें। दूसरों के छोटे से दुःख को बड़ा समझे। सादा सरल भोजन करें।

सादे कपड़े पहने। तीर्थों में काम, क्रोध, लोभ, द्वेष, अहंकार आदि के वशीभूत होकर किसी को कष्ट पीड़ा नहीं देना चाहिए। दुखी, अनाथ, अशक्त, साधु, ब्राह्मण, तपस्वी, विद्यार्थी, पीडि़त रोगी, अन्नहीन की सेवा, अन्न-वस्त्र पुस्तक आदि उन्हें दान करनी चाहिए। किसी से भी निवास स्थान या भोजन आदि पकाने के लिए बर्तनों की सेवा के अतिरिक्त अन्य कोई सेवा ग्रहण नहीं करनी चाहिए। मन वचन कर्म से भी परस्त्री दर्शन, स्पर्श, भाषण आदि भी नहीं करना चाहिए। पूर्ण ब्रह्मचर्य पालन का विशेष ध्यान रखना चाहिए। किसी भी सहयात्री को उसके रोग शोक में अकेले न छोड़ कर उसकी सेवा का ध्यान रखना पुण्य का काम होता है। किसी अन्य की कोई सेवा ग्रहण नहीं करनी चाहिए पर सेवा में लगे रहना चाहिए। अपने अधिकारों का त्याग कर कर्तव्यों को स्मरण रखना चाहिए। 

झूठा मान, कटुवचन, असत्य भाषण, आलस्य, अकर्मण्यता, बेईमानी चोरी, ईर्ष्या-द्वेष, शराब-कबाव, भाँग-चरस, बीड़ी तम्बाकू आदि से दूर रहना चाहिए। पंडित पुजारियों के असरल व्यवहार से परेशान न होकर मन्दिर दर्शन के समय पंक्तिबद्ध होकर रहना चाहिए। अपने बड़प्पन व अहंकार का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।

तीर्थों में किसी भी प्रकार का पाप न करें। जैसे तीर्थों में स्नान-दान, जप पूजा, व्रत उपवास, ध्यान दर्शन, सेवा सत्संग का महान फल प्राप्त होता है। वैसे ही वहां किए कपट, बेईमानी, झूठ, चोरी, मद्यपान, मांसभक्षण, जुआ, व्यभिचार, हिंसा आदि दुर्गुणों का पाप भी वज्र के समान हो जाता है।

तीर्थ यात्री को किसी दूसरे का भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए। जितेन्द्रिय रहकर सभी तरह के काम क्रोधादि का त्याग रखना चाहिए। 


6. तीर्थ स्नान कैसे करें ?

तीर्थ स्नान से पूर्व साष्टांग प्रणाम कर तीर्थ जल छूते हुए जो भी तीर्थ हो उसका नाम लेकर तीर्थाय नमः जैसे ‘ॐ गंगातीर्थाय नमः’ उच्चारण कर आचमन इत्यादि कर स्नान करना चाहिए।

सर्वप्रथम जल को मस्तक व सिर पर धारण करना चाहिए तब जल में प्रवेश कर पूर्व दिशा या जिस दिशा में सूर्य हो उस ओर मुख कर उन्हें जलांजलि प्रदान करनी चाहिए।

फिर उत्तर दिशा की ओर मुख कर सप्तर्षियों, भीष्म पितामह तथा अपने गुरूदेव के लिए जल छोड़ना चाहिए।

उसके बाद मातृकुल व पितृकुल के पित्तरों के लिए दक्षिण दिशा की ओर मुख कर जल देना चाहिए ।

उसके पश्चात् अपने इष्ट मन्त्र का जाप करते हुए डुबकी लगानी चाहिए।

स्नान करने से पूर्व रात्रि के वस्त्रों को बदल लेना चाहिए पवित्र धुले वस्त्रों से स्नान करना चाहिए क्योंकि वस्त्रों से निचुड़कर गिरने वाले जल को पितर ग्रहण करते हैं।

जल में मल मूत्र आदि का त्याग न करें।

कुल्ला आदि न करें।

नदी के किनारे गन्दगी न फैलाएं।

साबुन का प्रयोग न करें।

स्नान करते समय व्यर्थ का प्रलाप न करें।

जल विहार जल क्रीड़ा किलोल न करें।

यदि आस पास स्त्रियाँ स्नान कर रही हो तो टकटकी लगा कर उन्हें न देखें। ऐसा इन्द्रिय सुख मन में काम का संचार कर देता है जहां काम आ जाता है वहाँ राम प्राप्त नहीं होते।

डुबकी लगाते समय अपने प्रियजनों के नाम से भी डुबकी लगा लेनी चाहिए उससे उन्हें भी तीर्थ स्नान का लाभ प्राप्त हो जाता है।

तीर्थ स्नान के बाद दीपदान पुष्पाजलि आदि भेंट करे। साधु सन्तों, ब्राह्मणों भिखारियों आदि को अपने सामर्थ्य के अनुसार भोजन व वस्त्र दान करें।  


 

लेखक:-

अमर दास (संस्थापक)

श्री त्रिमूर्तिधाम

भैंरों की सेर कालका 133302

जनपद पंचकूला हरियाणा