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श्री हनुमान वन्दना

अतुलित बलधामं हेमशैलाभ देहं‚

दनुजवन कृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।

सकल गुण निधानं वानरानामधीशं‚

रघुपति प्रिय भक्तं वातजातं नमामी।।

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श्री बजरंग बाण

दोहा

निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करै सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥

जय हनुमान संत हितकारी। सुनि लीजै प्रभु विनय हमारी॥
जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महासुख दीजै॥
जैसे कूदि सिंधु के पारा। सुरसा बदन पैठि विस्तारा॥
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥

जाय विभीषण को सुख दीन्हा। सीता निरखिपरम पद लीन्हा॥
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥
अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥
लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभभई॥

अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतरयामी॥
जय जय लखन प्राण के दाता। आतुर हैव् दुख करहु निपाता॥
जय हनुमान जयति बल सागर। सुर समूह समरथ भट नागर॥
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीलै। बैरिहि मारु बज्र की कीलै॥

ॐ हीं हीं हीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर सीसा॥
जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकर सुवन वीर हनुमंता॥
बदन कराल काल कुल घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥
भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर। अगनि बेताल काल मारीमर॥

इन्हें मारू, तोहि सपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की॥
सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै। राम दूत धरु मारु धाई कै॥
जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुख पावत जन केहि अपराधा॥
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥

वन उपवन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं॥
जनक सुता हरि दास कहावौ। ताकि सपथ, विलम्ब न लावौ॥
जय जय जय धुनि होत अकासा। सुमिरत होय दुसह दुख नासा॥
चरण पकरि, कर जोरि मनावौं। यहि औसर अब केहि गोहरावौं॥

उठ उठ चलु, तोहि राम दोहाई। पायँ परौं, कर जोरि मनाई॥
ॐ चम चम चम चम चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥
ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल॥
अपने जन को तुरत उबारो। सुमिरत होय अनंद हमारो॥

यह बजरंग-बाण जेहि मारै। ताहि कहौ फिरि कवन उबारै॥
पाठ करै बजरंग-बाण की। हनुमत रक्षा करै प्राण की॥
यह बजरंग बाण जो जापै। तासों भूत-प्रेत सब कापैं॥
धूप देय जो जपै हमेसा। ताके तन नहि रहै कलेसा॥

दोहा

उर प्रतीति दृढ़, सरन हैव् पाठ करै धरि ध्यान।
बाधा सब हर, करै सब काम सफल हनुमान॥

कर्म अनुसार विशेष पूजन सामग्री

  • शरीर पीड़ा, रोग भय, शत्रु पीड़ा को नाश करने के लिए श्री बाला जी को नींबू की माला (108 नींबू) भेंट करनी चाहिए।
  • सुख प्राप्ति के हेतु द्राक्षा (108 द्राक्षा) की माला भेंट करनी चाहिए।  Continue reading →

औषधि – मधुमय (शुगर)

  • मधुमेह (शूगर) 
  • 9 पते देसी नींबू के
  • 9 पते नीम के
  • 9 पते बील के
  • गंगा जल के साथ, खाली पेट, 11 दिन भजन करते हुए खाऐं। 
  • भजन – कोई भी भजन जो आपको प्रिय हो। 
  • जेसे की – जय सिया राम। जय सिया राम। 
  • नोटः औषधि सेवन से पहले मधुमेह (शूगर) चैक कराएं तथा 11 दिन बाद भी चैक कराएं। प्रभु कृपा से मधुमेह (शुगर) सामान्य हो जाएगा।

 

कर्म अनुसार देव पूजन

  • जिनके घर में वास्तुदोष है, वे क्रूर्मावतार का पूजन करें।
  • जिन्होंने विदेश भ्रमण में जाना है, काम नहीं होता, वे मत्स्यावतार का पूजन करें।
  • जिनके भूमि के क्रय विक्रय के कार्य हैं, वे वराह देव का पूजन करें। Continue reading →

सेवाएं

नारायण सेवा

सभी आगन्तुकों के लिए धाम में निःशुल्क अन्नक्षेत्र की व्यवस्था है । जिसमें प्रातः नाश्ता तथा मध्याह्न व रात्री में भोजन परोसा जाता है।


नशानिवृति

नशा छोड़ने के इच्छुक जनों का विशेष प्रक्रिया से नशा छुड़ाया जाता है ।

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श्री भृगु शरण मन्त्र

ॐ श्री गणेशाय  नमः  

 श्री भृगु शरण मन्त्र – ( पूर्ण )

 ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं भृगवे नमः।। 

1. ॐ आत्मवेत्ता वेदान्त सूक्ष्म तत्व परं ग्रही।

विधि मानस भूतिश्च श्री भृगु शरणं मम्।।

2. ॐ ह्रींमीश स्यसंस्पर्शी ख्याति जानि स्वयं प्रभुः।

श्रीं सेवक पारिजातः श्री भृगु शरणं मम्।।

3. ॐ क्लीं अन्तः प्रकाशी च ज्योतिषां ज्योति रेव च।

महर्षिणां चन्द्र मौली श्री भृगु शरणं मम्।।

4. हसौं  हंसः परं ब्रह्म योगिनां योगचितप्रभुः।

रघूणां सुप्रकाशी च श्री भृगु शरणं मम्।।

5. प्रां भक्तैक रक्षी च भृगु पाताभ्रं भ्रंशनः।

मुनीनामुत्तमाचार्यः श्री भृगु शरणं मम्।।

6. क्रींमाद्या तत्व संवेत्ता षोडशी नेत्र कुमदक।

दत्तानुक्रोश पात्रश्च श्री भृगु शरणं मम्।।

7. हलीं विद्योपदेष्टा च पीत वस्त्रादि स्रगधरः ।

धाता विधाता शुक्रश्च श्री भृगु शरणं मम्।।

8. ऐं अपर्णा भरण बन्धु, दक्ष पूज्य कर ग्रहे।

नाना शास्त्र प्रकर्ता च श्री भृगु शरणं मम्।।

9. शिवाज विष्णु नामीशो दृष्टा तेषां च संस्थितिम्ः।

कमलाजः कमलाशापः श्री भृगु शरणं मम्।।

10. भृगु लताङ्कित हरि रिन्दरा मदमर्दनः।

विष्णु नम्यासुराचार्यः श्री भृगु शरणं मम्।।

11. रुद्रभ्राता शिवं दायी ब्रह्मचारि महेश्वरः।

भक्त भावी भक्त बोधि श्री भृगु शरणं मम्।।

12. सुधाब्धि योगवर्षी च योग भास्कर चोदयी।

श्याम श्यामा भेद वक्ता श्री भृगु शरणं मम्।।

13. कार्तिकेय शिवः स्कन्दः चराचर परं गतिः।

महर्षीणां सार्वभौमः श्री भृगु शरणं मम्।।

14. गंगा यमुना सरस्वत्यथ रेवा नर्मद भूग्रहः।

भक्त मानस हंसश्च श्री भृगु शरणं मम्।।

15. स्वयं ज्योति सुप्रकाशः सुमनोगः शांतिभूषणः।

शुभाशुभ परिद्रष्टा श्री भृगु शरणं मम्।।

16. ह्सौं श्रेष्ठः सर्वनामी सत्यधर्म प्रकाशकः।

सर्व बीजांकुरोदभासः श्री भृगु शरणं मम्।।

17. श्रीदः सर्वात्म भावी च सर्व कर्म प्रकाशकः।

सर्व लक्षण योगज्ञः श्री भृगु शरणं मम्।।

18. महर्षीणां परिवृढ: वृद्धः श्वेत लोमशः।

सुधा कमण्डलु धर्ता श्री भृगु शरणं मम्।।

19. कर्म योगाभास भास्वन् भास्करः पुण्य भूतिदः।

दानं तपो नामदर्शी श्री भृगु शरणं मम्।।

20. वेदान्त कर्म संग्राही भक्ति देव बनेचरः।

त्रिकालज्ञः कलाधारी, श्री भृगु शरणं मम्।।

21. षोढान्यास नेता च भक्तानुकम्पया द्रवी।

सुधावाणी विघ्नहर्ता श्री भृगु शरणं मम्।।

22. सर्वाशंका मनोज्ञाता, काम्य कर्म प्रकाशकः ।

कर्मा कर्म विपाकज्ञ: श्री भृगु शरणं मम्।।

23. सर्वधर्म परिष्कर्ता सत्यमार्ग विशोधकः।

शरणागत संमरी शान्तः श्री भृगु शरणं मम्।।

24. तन्त्रमार्ग परिष्कारी प्रवृत्तिश् च निवृत्तिकः।

सर्व देवांश शंसी च श्री भृगु शरणं मम्।।

25. सुधा स्त्रोत वही वाणी योगार्णव मन्थनी हरिः।

सर्वशस्त महानामा श्री भृगु शरणं मम्।।

26. कृष्ण चिन्तयो राम मोदी शिवस्तोताम्बिकानुतः ।

सर्वयुग परिभूतः श्री भृगु शरणं मम्।।

27. सर्व साक्षी सर्वमार्गी सर्वशास्त्र प्रवर्तकः।

सर्वेभ्यः सुखदाता च श्री भृगु शरणं मम्।।

28. सच्चिदानन्द रूपश्च सत्कला सुप्रवर्धनः।

सर्वनामी सर्व सौम्यः श्री भृगु शरणं मम्।।

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समय

मन्दिर में दर्शन का समय 7:00 AM to 6:45 PM

मुख्य आरती समय

  • श्रृंगार आरती प्रातः 8:00 बजे
  • भोग आरती मध्याह्न 11:45 बजे
  • सान्ध्य आरती सांय: 6:00 – 6:30 बजे
  • शयन आरती रात्रि 6:45 बजे

पोशाक नियम / पूजन अर्चन सूची

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  2. महर्षि भृगुजी के 108 नाम - Download PDF for offline reading
  3. श्री राम जी के 108 नाम - Download PDF for offline reading
  4. श्री विष्णुजी के 108 नाम - Download PDF for offline reading
  5. श्री शंकर जी के 108 नाम - Download PDF for offline reading
  6. श्री उमा जी के 108 नाम - Download PDF for offline reading
  7. श्री महामाया जी के 108 नाम - Download PDF for offline reading
  8. श्री हनुमान जी के 108 नाम - Download PDF for offline reading
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शिव पूजा कैसे ? – शिव भगतों की जानकारी हेतु – शिव पूजन विशेष

  • देव पूजन करने से पूर्व स्नान कर शुद्ध होना एवं शुद्ध वस्त्र धारण करना तो होता ही है, पर शिव पूजन करने वाले को सिले हुए वस्त्र पहने हुए नहीं होना चाहिए। पुरूषों के लिए लाँग वाली धोती पहने हुए होना बहुत ही अच्छा है। आसन, जिस पर बैठें, शुद्ध होना चाहिए। पूजा के समय पूर्व या उत्तर मुख बैठना और पूजन का संकल्प करना बहुत ही श्रेष्ठ है। भस्म, त्रिपुण्ड और रूद्राक्ष माला पूजक के शरीर पर विशेष तौर पर होना चाहिए।
  • भगवान शंकर की पूजा में केतकी का प्रयोग नहीं होता न ही किसी प्रकार का चम्पा पुष्प चढ़ाया जाता है। भगवान शिव के चरणों में पुष्प चढ़ाये जाने चाहिए, न कि शिवलिङ्ग के ऊपर। पुष्प माला शिवलिङ्ग को पहनाई जा सकती है। सभी देवों के चरणों में ही पुष्प छोड़े जाने चाहिए। शिवलिङ्ग के चरणों में :-
    • सोमवार को गेंदे के फूल,
    • मंगलवार को आक के फूल,
    • बुधवार को धतूरे के फूल,
    • वृहस्पतिवार को गुलाब के फूल,
    • शुक्रवार को चांदनी के फूल,
    • शनिवार को लाल कनेर के फूल,
    • रविवार को आक, धतूरा और गेंदे के फूल
      किसी पात्र या पत्ते पर रखकर अर्पण करने चाहिए।
  • पत्ता आक या एरंड का त्याज्य है।
  • शिव पूजा में तुलसी दल और दुर्वा चढ़ाया जाता है।
    • तुलसी मंजरी शिव को अधिक प्रिय है।
    • नील कमल का पुष्प शिव को बहुत प्रिय है। कुमुदिनी पुष्प अथवा कमलिनी पुष्प का भी प्रयोग शिव पूजा में होता है।
  • शिव अभिषेक प्रिय हैं – अतएव उनका अभिषेक विशेष सावधनी से होना चाहिये
    • बिल्व पत्र तो इनकी पूजा में प्रधान है ही, किन्तु उसमें चक्र या वज्र न होना चाहिए न ही पत्र कटा फटा हो। बिल्व पत्रों में कीड़ों द्वारा बनाया हुआ जो सफेद चिन्ह होता है, उसे ही चक्र कहते हैं और बिल्व पत्र की डण्ठल की ओर जो मोटा भाग होता है, उसे ही वज्र कहते हैं, उस भाग को तोड़ देना चाहिए।
    • शिवार्पण के हेतु बिल्व पत्र सोमवार व बुधवार के दिन नहीं तोडे़ जाने चाहिये। अभाव में शिव को पहले अर्पण किया बिल्व पत्र जल से शुद्ध करके पुनः चढाया जा सकता है।
    • बिल्व पत्र शिवलिङ्ग पर उल्टा चढाया जाता है न कि सीधा।
    • बिल्व पत्र तीन दल से लेकर ग्यारह दलों तक के प्राप्त होते हैं। यह जितने अधिक दलों के हों उतने ही उत्तम हैं, पर इनमें यदि कोई दल टूट गया हो तो, चढ़ाने योग्य नहीं होता।
  • भगवान शिव की पूजा में खरताल नहीं बजाया जाता।
  • शिव की परिक्रमा में सम्पूर्ण परिक्रमा नहीं की जाती। जिधर से चढ़ा हुआ जल निकलता है, उस नाली का उल्लंघन न कर उस से उल्टी दिशा में प्रदक्षिणा की जाती है। पर यदि नाली ढकी हुई हो तो प्रदक्षिणा में कोई दोष नहीं है।
  • भगवान आशुतोष शिव को सीधे प्रणाम न करके नन्दी जी के पीछे जाकर दण्डवत करना चाहिये। शिवलिङ्ग और नन्दी के मध्य में से नहीं गुजरना चाहिये।
  • स्त्रियों को पाषाणलिङ्ग व धतुलिङ्ग का पूजन करना शास्त्रोक्त नहीं है –
    • उन्हें पार्थिव लिङ्ग का (बालू का लिङ्ग) निर्माण करके गृह स्थान में ही पूजन करना चाहिये। भगवती सीता ने – भगवती अञ्जना ने – भगवती अनुसूया ने भी पार्थिव लिङ्ग बना कर शास्त्रानुसार उसका पूजन किया था। किन्तु कलि के इस युग में शिवालयों में नारियाँ अनजाने में पाषाणादि लिङ्ग का पूजन करती इत स्ततः नजर आती हैं। जो कि मर्यादा के प्रतिकूल है।
    • हाँ, भगवान शंकर के विग्रह का वह पूजन कर सकती हैं – उसमें कोई दोष नहीं है।

-ः विशेष :-

शिवलिङ्ग पर सतत जलधारा से कलह का नाश होता है।

तेल धारा से शत्रुओं का नाश होता है।

मधु (शहद) धारा से यक्ष पद की प्राप्ति सम्भव होती है।

ईषू रस धारा (गन्ने का रस) से सर्व विद्ध मंगल प्राप्ति होती है।

गंगा जल की धारा से भक्ति व मुक्ति की प्राप्ति होती है।

उपरोक्त से अभिषेक करने के पश्चात 11 ब्राह्मणों को भोजन भी करवाना आवश्यक है।

अब जान लें किन-किन पत्र, पुष्पों व द्रव्य को चढ़ाने से कौन सी कामना की सिद्धि होती है :-

  • कुशा व दुर्वा – आयु वृद्धि (1 लाख पूजन होने पर)
  • कनेर – रोग नाश
  • तुलसी – मुक्ति
  • हार सिंगार – सुख सम्पत्ति
  • आक के फूल – यश वृद्धि
  • अखण्डित चावल – लक्ष्मी प्राप्ति
  • जवा व राई के फूल – शत्रु नाश
  • तिल – पाप नाश
  • दश करोड पार्थिव लिङ्ग पूजा हो – फूल चावल चन्दनादि की अखण्ड धारा हो – प्रति मंत्र एक कमल – शतपत्र – बेलपत्र चढाते रहें अगर शंख पुष्प हो तो विशेष है – इस से राजा पद प्राप्त होना सम्भव होता है।
  • रूद्र पूजा चावल व तिल से करें – सुन्दर वस्त्र चढावें – श्री फल, गन्ध, पुष्प, धूप दीप विशेष हो।
  • उपरान्त 12 ब्राह्मणों को भोजन – दक्षिणा – वस्त्र इत्यादि के साथ करावें।

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मन्दिर और तीर्थ में क्यों जाएं?

मन्दिर और तीर्थ में क्यों जाएं?

1. मन्दिर में क्यों जाएं?

2. मन्दिर में कैसे जाएं-क्यां भेंट करें?

3. तीर्थ यात्रा क्यों करें?

4. तीर्थ यात्रा कैसे करें?

5. तीर्थ यात्रा करते समय

6. तीर्थ स्नान कैसे करें? 

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सेवकों के ध्यानार्थ

  1. सेवक के लिए अमर्यादित परिधान वर्जित है – निर्धारित परिधान पीत धोती कुर्त्ता अथवा पीत कुर्त्ता पायजामा पहन कर धाम में वास करें।
  2. सेवा में मौन को महत्व दें।
  3. सेवा का अहंकार न करें।
  4. परनिन्दा, चुगली, द्वेष आदि न करें।
  5. बाहर से लाई गई कोई भी वस्तु सेवनीय नहीं है।
  6. स्वयं भी मर्यादित रहें तथा दूसरों को भी मर्यादा में रहने के लिए प्रेरित करते रहें।
  7. श्री धाम में जहाँ प्रवेश वर्जित किया गया हो – बिना आज्ञा प्रवेश न करें।
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भक्तों के ध्यानार्थ

  1. श्री त्रिमूर्तिधाम में प्रभु मौन की भाषा समझते हैं – अतएव भक्तों को मौन भाव से उनके समक्ष प्रार्थित होना चाहिए। जप वगैरा मन ही मन में करें।
  2. श्री त्रिमूर्तिधाम में अमर्यादित परिधान पहन कर आना व अमर्यादित आचरण निन्दनीय है।
  3. बाहर से लाई कोई भी वस्तु धाम में सेवनीय नहीं है।
  4. श्री बाला जी के समक्ष नमन करें – वहां न तो बैठें न ही खड़े हों – जो भी प्रार्थना वगैरा करनी हो श्री प्रेतराज दरबार में करें। श्री बालाजी एकाग्र चित भगत कि पुकार सुनते हैं – इस लिए उनके समक्ष अनावश्यक जय जय कार करना भी अशोभनीय है।
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नियमावली

श्री त्रिमूर्तिधाम में पालनीय आवश्यक नियम-

  • श्री त्रिमूर्तिधाम में सिगरेट, बीड़ी, चाय पीना, पान खा कर आना तथा और भी सभी तरह के नशे निषिद्ध हैं।
  • कोई भी यात्री तहमद, चमड़े के परिधान अभद्र पोशाक पहन कर न आवें।
  • अपने जूते चप्पल यथा स्थान पर खोल कर हाथ मुंह धो कर कुल्ला करके मन्दिर में आवें ।
  • कोई भी रजस्वला शुद्ध  होकर 6 दिन के बाद ही धाम पर आवे तथा शुद्ध होने के बाद ही भभूति भोग या जल और पेशी का लड्डू खावें।
  • गोद के बच्चों को यथा सम्भव धाम पर न लावें क्योंकि उनका अनायास रूदन और टट्टी पेशाब कर देना धाम की शान्ति और पवित्रता भंग कर देता है।
  • प्रत्येक व्यक्ति को स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहन कर शुद्ध चित्त व समर्पण भाव से दरबार में आना चाहिए क्योंकि प्रभु के प्रति समपर्ण ही सबसे बड़ी निष्ठा है जिससे भाव सिद्धि प्राप्त होती है।
  • श्री बाला जी सभागार में पुरूषों को बाला जी के दाईं तरफ और नारियों को बाईं तरफ खड़ा रहना चाहिए । जब आरती हो रही हो तो इस नियम का पालन अत्यावश्क है।
  • मन्दिर के प्रांगण में किसी प्रकार की बातचीत हंसी मजाक व किसी के साथ अभद्र व्यवहार नहीं करना चाहिए।
  • मन्दिर की ओर पैर फैलाकर पीठ फेर कर बैठना और सोना अभद्रता है जिसे श्री बाला जी कतई पसन्द नहीं करते।
  • श्री त्रिमूर्तिधाम की किसी भी मूर्ति को स्पर्श करना स्वयं जल, प्रसाद या फूल बगैरा चढ़ाना सर्वथा वर्जित है कोई भी वस्तु चढ़ानी हो तो पुजारी के हाथ में दें वह स्वयं भेंट किया गया पदार्थ मूर्ति पर चढ़ा देंगे।
  • रूपया पैसा हुण्डी में प्रेम से डालें । वह फैंके नहीं क्योंकि प्रेम से अर्पण द्रव्य ही प्रभु स्वीकार करते हैं । यदि आप मन्दिर को कोई विशेष धनराशि भेंट कर रहे हों तो उसकी रसीद पुजारी से ले लें तांकि धनराशि का दुरूपयोग न हो सके।
  • कोई भी पूजन सामग्री स्वयं स्पर्श न करें न चोला इत्यादि या भोग मूर्ति पर स्वयं चढ़ावें।
  • जिस किसी को सवामनी भण्डारा ब्रह्मभोज हवन इत्यादि करवाना हो या चोला चढ़ाना हो वह संस्थापक महंत जी के पास अथवा मुख्य पुजारी के पास ही निवेदन करे।
  • सभी को अखाद्य आहार मांस अण्डा इत्यादि व लहसुन, प्याज आदि निषिद्ध पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिये।
  • सभी स्त्री-पुरूष पूर्ण ब्रह्मचर्य व नियमित संयमित होकर ही श्री त्रिमूर्तिधाम की सीमा में रहें।
  • कोई भी व्यक्ति किसी अन्य का प्रसाद ग्रहण न करें क्योंकि इससे प्रसाद ग्रहण करने वाले पर प्रसाद बांटने वाले का संकट आ सकता है । केवल मन्दिर से मिलने वाला प्रसाद ही ग्रहण करें।
  • शस्त्र, रेडियो वगैरा लेकर आना, कैमरे से मन्दिर के अन्दर बाहर या किसी रोगी का पेशी लेते हुए फोटो लेना और ऐसे ही अन्य अनुचित कार्य सर्वथा वर्जित हैं।
  • श्री त्रिमूर्तिधाम में ‘श्री अञ्जना माता जी की रसोई’ के अन्तर्गत अन्नक्षेत्र की भी व्यवस्था है, उसके लिए सभी प्रकार का दान भी स्वीकार किया जाता है।
  • मनोकामना पूर्ति हेतु या मनोकामना पूर्ति के पश्चात कोई भी व्यक्ति चोला चढ़ाना चाहे, या सवामनी भण्डारा करवाना चाहे तो उसकी व्यवस्था उचित राशि लेने के पश्चात मन्दिर की ओर से होगी । मन्दिर सभी प्रकार का दान स्वीकार करता है।
  • श्री त्रिमूर्तिधाम में बाहर से लाकर कोई खाद्य पदार्थ या अन्न इत्यादि न खाएं इससे आपका अनिष्ट भूत, प्रेत आदि द्वारा हो सकता है।
  • मनोकामना पूर्ति या पुण्य प्राप्ति हेतु मंदिर प्रांगण में जागरण किया जा सकता है । जिसके नियम निम्न हैं:-
    • जागरण जप ध्यान करते हुये चुपचाप रहें।
    • उससे पहले स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहन लें।
    • जागरण हेतु रात्रि के प्रथम पहर में ही बैठ जावें व अपने आसन पर ही बैठे रहें केवल विशेष परिथिति में ही अपने आसन से उठें।
    • जो अशक्त व्यक्ति निरन्तर नहीं बैठ सकते वह रात्रि प्रथम पहर से रात्रि 12 बजे तक बैठें उसके पश्चात् धाम से बाहर जा कर विश्राम कर सकते हैं और ब्रह्ममुहूर्त से पूर्व नहा धोकर पुनः सूर्योदय तक बैठें।
    • जागरण पूरे मन और निष्ठा से करें मात्र दिखाने के लिए न करें।
  • श्री बाला जी को केवल नारियल का भोग ही लगता है । अतः अन्य प्रकार का भोग न लावें।

विनीत-

अमर दास रत्न, संस्थापक महन्त,

श्री त्रिमूर्तिधाम, भैरों की सेर

कालका (हरियाणा)-133 302

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भृगु स्तोत्रम्

आदि देव! नमस्तुभ्यं प्रसीदमे श्रेयस्कर। पुरुषाय नमस्तुभ्यं शुभ्रकेशाय ते नमः॥

तत्व रथमारूढं ब्रह्म पुत्रं तपोनिधिम्। दीर्घकूर्चं विशालाक्षं तं भृगुं प्रणमाम्यहम्॥

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श्री बाला जी से शयन प्रार्थना

नयनों में नींद भर आई श्री बालाजी को

कौन श्री बालाजी की सेज बिछावे 

कौन ओढ़ावे रजाई श्री बालाजी को। 

नयनों में नींद भर आई श्री बालाजी को

आप भक्त सब सेज बिछावे 

केसरी ओढ़ावे रजाई श्री बालाजी को।

नयनों में नींद भर आई श्री बालाजी को

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श्री राम जी की आरती

जगमग, जगमग, जोत जगी है, राम आरती, होन लगी है। जगमग, जगमग, जोत जगी है।

मन्द मुस्कान, स्मित मुस्काई, अदभुत छवि, कैसी है बनाई,
भव तरन की अब – आस जगी है। — राम आरती, होन लगी है। 

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जगमग, जगमग, जोत जगी है, राम आरती, होन लगी है। जगमग, जगमग, जोत जगी है।

मन्द मुस्कान, स्मित मुस्काई, अदभुत छवि, कैसी है बनाई,
भव तरन की अब – आस जगी है। — राम आरती, होन लगी है। 

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जगमग, जगमग, जोत जगी है, राम आरती, होन लगी है। जगमग, जगमग, जोत जगी है।

मन्द मुस्कान, स्मित मुस्काई, अदभुत छवि, कैसी है बनाई,
भव तरन की अब – आस जगी है। — राम आरती, होन लगी है। 

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