नमो केसरी पूत महावीर वीरं, मंङ्गलागार रणरङ्गधीरं।
कपिवेष महेष वीरेश धीरं, नमो राम दूतं स्वयं रघुवीरं।
नमो अञ्जनानंदनं धीर वेषं, नमो सुखदाता हर्ता क्लेशं।
नमो केसरी पूत महावीर वीरं, मंङ्गलागार रणरङ्गधीरं।
कपिवेष महेष वीरेश धीरं, नमो राम दूतं स्वयं रघुवीरं।
नमो अञ्जनानंदनं धीर वेषं, नमो सुखदाता हर्ता क्लेशं।
संसार के पालन हार हो तुम‚ बाला जी तुम्हारी जय होवे‚
हम सबके प्राण आधार हो तुम‚ बाला जी तुम्हारी जय होवे।
संसार के पालन हार हो तुम‚ बाला जी तुम्हारी जय होवे।
श्री दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्र || श्री दुर्गाष्टोत्तरशतनामावली
1. ॐ सती
2. साध्वी
3. भवप्रीता
4. भवानी
5. भवमोचनी
6. आर्या
Continue reading →1 श्री सोमनाथ महादेव
2 श्री मल्लिकार्जुन
3 श्री महाकाल
4 श्री ॐकारेश्वर
5 श्री वैद्यनाथ
Continue reading →(इनका स्मरण करने से दुःख – द्वन्द दूर रहते हैं।)
1. श्री हनुमते नमः
2. श्री अंजनिसुताय नमः
3. श्री वायुपुत्राय नमः
4. श्री महाबलाय नमः
5. श्री रामेष्टाय नमः
Continue reading →
श्री भगवान महादेव का स्वयंभू श्री विग्रह है। वे महादेव जो औघड़दानी हैं। भक्तवाँछा कल्पतरु हैं। जिनका भोलापन और आशुतोष होना चिरप्रसिद्ध है।
श्री द्वादश ज्योतिर्लिंग नाम गायत्री
महा मृत्युंजय मन्त्र – Maha Mirtunjay Mantra
शिव त्रिपुरे मन्त्र – Shiv Tripurare Mantra
श्री भगवान शंकर के भ्रूमध्य से प्रकट प्रलयंकर भैरव जिन्होंने श्री ब्रह्मा जी का पाँचवा सिर अपने नखों से विदीर्ण कर नोंच डाला था का परिचय शास्त्रों में मुक्तिदायिनी काशी के वासी के रूप में दिया जाता है तथा विश्वेश्वर की इस नगरी के रक्षक के रूप में (कोतवाल) इन्हीं की मान्यता है।
श्री बाला जी हनुमान जी के महामन्त्री जिनका विग्रह दिव्य है। श्री हनुमान जी ने जब लंका दहन की उस समय ऋषि नीलासुर ने जो दसकन्धर रावण की सेवा में थे अपनी मायावी विद्या से उसे रोकने की बहुत चेष्टा की, किन्तु अग्नि शान्त होने की अपेक्षा अधिक प्रज्जवलित होती गई। क्योंकि:-
उस समय ‘हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास’ (राम चरित्त मानस सुन्दर काण्ड दोहा 25)
अतएव श्री हनुमान जी की यह अदभुत लीला देखकर ऋषि नीलासुर जान गए कि श्री हनुमान जी कोई दिव्य देहधारी हैं और उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए और उनसे पूछा कि आप कृपया अपना परिचय मुझे दीजिए। कहीं आप साक्षात् श्री विष्णु, ब्रह्मा व शिव में से कोई एक तो नहीं?
श्री हनुमान जी ने स्मित मुस्कान लिए उनकी ओर देखा और कहा- ऋषिवर, मैं न तो हरि हूँ न ब्रह्मा। मैं तो श्री राम जी का सेवक हूँ जो स्वयं नारायणावतार हैं उन्हीं की कृपा मुझ पर है जो मेरी लूम में प्रज्जवलित अग्नि भी मुझे कोई दाह प्रदान नहीं कर रही है और आपकी मायावी शक्ति भी उस अग्नि को बुझा नहीं पा रही है- इसलिए आप भी रावण को कहें कि वह श्री राम जी की शरण ग्रहण कर ले।
इस पर ऋषि नीलासुर ने श्री हनुमान जी से उन्हें भी श्री राम जी की शरण में ले जाने की प्रार्थना की जिसे श्री हनुमान जी ने लंका युद्ध के पश्चात पूरा किया। उपरान्त जब श्री राम जी ने सरयू में गमन करने से पूर्व श्री हनुमान जी को धरा धाम पर रहकर भक्तों का कल्याण करने का आदेश दिया, तब श्री हनुमान जी ने भी ऋषि नीलासुर को अपना महामन्त्री घोषित करते हुए आकाश गामी सूक्ष्म शक्तियों का आधिपत्य करने को कहा और उन्हें प्रेतराज सरकार की उपाधि से विभूषित कर दिया। तब से ऋषि नीलासुर को प्रेतराज सरकार कह कर जाना जाता है।
श्री त्रिमूर्तिधाम में भी बैठकर वे सबके सब तरह के संकट निवारण करते हैं व मनोरथ पूर्ण करते हैं।
श्री केसरी नन्दन जो ग्यारहवें रूद्र हैं- जो सभी गुणों के भण्डार हैं- ज्ञानियों में सर्वश्रेष्ठ, दुष्टों का विनाश करने वाले, सुवर्ण कान्ति के समान देह वाले वानर वीर महावीर श्री हनुमान जी का ही नाम है जो भगवान शंकर का ही अवतार हैं। श्री हनुमान जी के विषय में नारद पुराण में कहा गया है-
सः सर्वरूपः सर्वज्ञ सृष्टि स्थिति करोवतु। स्वयं ब्रह्मा स्वयं विष्णुः साक्षाद् देवो महेश्वरः।।
नारदपुराण पू पाद 78/24/25
वे सर्व स्वरूप तथा सृष्टि रचते और उसका पालन करते हैं, और विनाशक भी वही हैं – वे ही स्वयं ब्रह्मा, विष्णु तथा साक्षात् शिव हैं।
और
शिवावतार श्री हनुमान जी की पूजा भारत में ही नहीं विश्व में अनेकत्र स्थानों पर बडी़ श्रद्धा से की जाती है।
गुरू जी ने बताया, अगस्त 1986 की एक रात जब दास पूजा कक्ष में ध्यानावस्थित बैठा था । तब दास को दिव्य आभास हुआ कि इस दिव्य शिला पर भगवान मारुति बैठे हैं और दास से कह रहे हैं कि मैं यहां प्राचीन काल से विराजमान हूं तुम इस शिला पर मेरा मन्दिर बनवाओ इस शिला से 25 कदम पूर्व की ओर एक अन्य शिला है जिसमें मेरे अभिन्न संगी श्री प्रेतराज जी की शक्ति विराज रही है मन्दिर निर्माण करते समय मेरी शिला का जब फालतु भाग काटोगे तो उसके नीचे भैरव सरकार जी की शिला स्वतः प्राप्त हो जायेगी।
दूसरे दिन दास अपने प्रिय साथी राजेन्द्र कुमार को साथ लेकर भैरों की सैर गांव में श्री पंडित सीता राम जी के निवास स्थान पहंुचा जो कि दास परिवार के पुरोहित भी हैं तथा उनसे इस दिव्य आभास का जिकर किया वह फौरन ही सहयोग के लिए तैयार हो गये । ढूँढते-2 हम तीनों ने इस पवित्रा शिला को ढूँढ लिया-दास को यह देख कर अत्यन्त प्रसन्नता हुई कि शिला पर वे सभी दिव्य चिन्ह विराजमान थे उनसे कुछ हटकर प्रभु श्री राम की भव्य छवि थी । शिला के ठीक बीच में श्री बाला जी के चरणों से कुछ हटकर एक छोटा सा पेड़ था और ऊपर के भाग पर मुकुट की तरह कांटेदार थोहर का पौध था, हमने शिला को प्रणाम किया और लौट आए।
पर्वत शिखा पर जहां कांटेदार वृक्षों व घास के सिवा कुछ न था मन्दिर निर्माण कार्य सहज न था फिर भी श्री बाला जी की कृपा से कार्य पूर्ण हुआ । यह दिव्य श्री त्रिमूर्तिधाम सदा ही सबका संकट निवारण करता रहेगा तथा सभी को आध्यात्मिक शान्ति प्रदान करेगा और श्रद्धालु भक्तों के मनोरथ पूर्ण करता रहेगा।