बीज मंत्र
प्रसिद्ध मंत्र
ॐ हौं जूँ सः । ॐ भूर्भुवः स्वः । ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् । स्व: भुवः भूः ॐ । सः जूँ हौं ॐ ।
ॐ हौं जूँ सः । ॐ भूर्भुवः स्वः । ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् । स्व: भुवः भूः ॐ । सः जूँ हौं ॐ ।
बीज मंत्र|| ॐ भूर्भुवः स्वः ||
|| ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।।
जय प्रेतराज राजा, जय प्रेतराज राजा। संकट मोचन वीरा, संकट मोचन वीरा। जय जय अधिराजा, जय प्रेतराज राजा।
रूप भयंकर ऐसा, थर स्वामी थर थर थर काल करें। काल करे जिन पिशाच सब काँपे, जिन्न पिशाच सब काँपे
जिनको बेहाल करे, जय प्रेतराज राजा।
हाथ में चक्र तिहारे, मुकुट निराला है। स्वामी मुकुट निराला है सुयश तुम्हारा निर्मल, सुयश तुम्हारा निर्मल
गल मोतिन माला है, जय प्रेतराज राजा। लीला बखानूँ कैसे, महिमा निराली है। तिहारी
महिमा निराली अज्ञान अन्धेरा मिटा, अज्ञान अन्धेरा मिटा। करते उजियाली है, जय प्रेतराज राजा।
चित्त चरणों में लगा कर तिहारा स्नान करें । स्वामी तिहारा स्नान करें । पूजा फूल चढ़ावे, पूजा फूल चढ़ावे । आरती ध्यान करें, जय प्रेतराज इच्छा स्वामी करते, संकट पूरी करते संकट हर हर राजा । लेते । लेते । दुःख दारिद मिटाते, दुःख दारिद मिटाते सुख सम्पति देते, जय प्रेतराज राजा ।
आरती करो, भैरव की करो, भैरव की, काल भैरव की, आरती करो भैरव की।
सिर पर जिनके मुकुट विराजे, काँधे मूँज जनेऊ साजे सिर पर जिनके मुकुट विराजे, काँधे मूँज जनेऊ साजे। सदा एक सी लो में रहते, हनुमत की शंकर की। आरती करो, भैरव की करो, भैरव की, काल भैरव की आरती करो भैरव की।
एक हाथ में खड्ग विराजे पाश दूसरे हाथ में साजे। एक हाथ में खड्ग विराजे पाश दूसरे हाथ में साजे। तीजे हाथ कमण्डुल धारे, चौथे मुद्रा वर की। आरती करो, भैरव की करो, भैरव की, काल भैरव की आरती करो भैरव की।
भूत गणों को फाँसी देते, संतो के संकट हर लेते। भूत गणों को फाँसी देते, संतो के संकट हर लेते। कृपा करते भक्त जनों पर लीला हे नटवर की। आरती करो, भैरव की करो, भैरव की, काल भैरव की,
आरती करो भैरव की।
महिमा तुम्हारी कौन बखाने, जग का बच्चा बच्चा जाने महिमा तुम्हारी कौन बखाने, जग का बच्चा बच्चा जाने। रमते भैरों सेर में निश दिन, कृपा से शंकर की। आरती करो, भैरवं की करो, भैरव की, काल भैरव की
आरती करो भैरव की।
श्वान सवारी शोभा पायें, खुद भी नाचें सब को नचायें। श्वान सवारी शोभा पार्य, खुद भी नाचें सब को नचायें। सारे कारज हो दुनियाँ के, लीला से भैरव की। आरती करो, भैरव की करो, भैरव की, काल भैरव की, आरती करो भैरव की
दोहा
अज अनादि अविगत अलख, अकल अतुल अविकार । वन्दौ शिव पद युग कमल, अमल अतीव उदार ॥ आर्तिहरण सुख करण शुभ, भक्ति मुक्ति दातार । करौ अनुग्रह दीनलखि, अपनों विरद विचार || पर्यापतित भव कूप महँ, सहज नरक आगार । सहज सुहृद पावन पतित, सहजहि लेहु उबार ।।
पलक पलक आशा भरयो, रह्यो सुबाट हरो तुरन्त स्वभाव वश, नेक न करो अवार।। चौपाई निहार।
जय शिव शंकर औढरदानी, जय गिरि तनया मातुभवानी। सर्वोत्तम योगी योगेश्वर, सर्वलोक ईश्वर परमेश्वर ॥ सब उर प्रेरक सर्व नियन्ता, उपद्रष्टा भर्ता अनुमन्ता। पराशक्ति पति अखिल विश्वपति, परब्रह्म परधाम परमगति ॥
सर्वांतीत अनन्य सर्वगत, निजस्वरूप महिमा में स्थितरत। अंग भूति भूषित श्मशानचर, भुंजग भूषण चन्द्रमुकुटधर । वृषवाहन नन्दीगण नायक, अखिल विश्व के भाग्य विधायक। व्याघ्रचर्म परिधान मनोहर, रीछ चर्म ओढ़े गिरिजावर ||
कर त्रिशूल डमरूवर राजत, अभय वरद मुद्रा शुभसाजत । तनु कर्पूर गौर उज्जवलतम, पिंगल जटाजूट सिरउत्तम ॥ भाल त्रिपुण्ड्र मुण्डमालाधर, गलरुद्राक्षमाला शोभाकर। विधि हरि रुद्र त्रिविध वपुधारी, बने सृजन पालन लयकारी ॥
तुम हो नित्य दया के सागर, आशुतोष आनन्द उजागर । अति दयालु भोले भण्डारी, अग जग सब के मंगलकारी सती पार्वती के प्राणेश्वर, स्कन्द गणेश जनक शिव सुखकर हरिहर एक रूप गुणशीला, करत स्वामी सेवक की लीला ||
रहते दोउ पूजत पूजवावत, पूजा पद्धति सबन्हि सिखावत । मारुति बन हरि सेवा कीन्ही, रामेश्वर बन सेवा लीन्ही ॥ जगहित घोर हलाहल पीकर, बने सदाशिव नीलकण्ठ बर । असुरासुर शुचि वरद शुभंकर, असुर निहन्ता प्रभुप्रलयंकर ।।
‘नमः शिवाय’ मन्त्र पञ्चाक्षर, जपत मिटत सब कलेश भयंकर । जो नर नारि रटत शिव शिव नित, तिनको शिव अति करत परमहित ।। श्रीकृष्ण तप कीन्हो भारी, है प्रसन्न वर दियो पुरारी । अर्जुन संग लड़े किरात बन, दियो पाशुपात अस्त्र मुदित मन ।।
भक्तन के सब कष्ट निवारे, दे निज भक्ति सबन्हि उद्धारे । शंखचूड जालन्धर मारे, दैत्य असंख्य प्राण हर तारे ।। अन्धक को गणपति पद दीन्हो, शुक्र शुक्रपथ बाहर कीन्हों । तेही सजीवनि बिद्या दीन्हीं, बाणासुर गणपति गति कीन्ही ।।
अष्टमूर्ति पंचानन चिन्मय, द्वादश ज्योति लिंगज्योतिर्मय । भुवन चर्तुदश व्यापक रुपा, अकथ अचिन्त्य असीम अनूपा ।। काशी मरत जन्तु अवलोकी, देत मुक्ति पद करत अशोकी । भक्त भागीरथ की रुचि राखी, जटा बसी गंगा सुर साखी |
रूरू अगस्त्य उपमन्यु ज्ञानी, ऋषि दधीचि आदिक विज्ञानी । शिव रहस्य शिव ज्ञान प्रचारक, शिवहिं परम प्रिय लोकोद्धारक ॥ इनके शुभ सुमिरन तें शंकर, देत मुदित है अति दुर्लभ वर । अति उदार करुणा वरूणालय, हरण दैन्य द्रारिद्रय दुख भय ॥
तुम्हरो भजन परम हितकारी, विप्र शुद्र सब ही अधिकारी। • बालक वृद्ध नारि नर ध्यावहिं, ते अलभ्य शिवपद को पावहिं। 11 भेद शून्य तुम सबके स्वामी, सहज सुहद सेवक अनुगामी । जो जन शरण तुम्हारी आवत, सकल दुरित तत्काल नशावत ।।
दोहा
वहन करो तुम शीलवश, निज जन को सब भार गनौ न अघ अघ जाति कछु, सब विधि करौ संभार ॥ तुम्हरो शील स्वभाव लखि, जो न शरण तव होय। तेहि सम कुटिल कुबुद्धि जन, नहिं कुभाग्य जन कोय दीन हीन अति मलिन मति, मैं अघ ओघ अपार । कृपा अनल प्रकटौ तुरत, करौ पाप सब छार॥ कृपा सुधा बरसाय पुनि, शीतल करौ पवित्र । राखौ पद कमलनि सदा, कुपात्र के मित्र ॥
दोहा
श्री भृगु कमल पद ध्यान धर, श्री हनुमत चरण चित्तलाय। श्री प्रेत चालीसा कहूँ, देवी-देव मनाये ॥
चौपाई
जय श्री प्रेतराज सुखसागर, करूणामय दया के सागर। प्रबल वीर भव कष्ट हारी, जय श्री प्रेतराज सुखकारी ॥ शीश मुकुट सुहावन सोहे, रूप तेरा जग पावन मोहे। गल मणिमाल मनोहर साजे, तेज लखि सूरज भी लाजे ॥
हाथ चक्र अति विकट कराला, धारण किए धनुष और भाला। रत्न जटित सिंहासन सोहे, छत्र चंवर सब के मन मोहे || सुर नर मुनि जन सब यश गावें राम दूत के दूत हाथी की असुवारी करते भक्त जनों का संकट हरते।
दूतों की सेना अतिभारी, साथ चले सब देते तारी। जो हनुमान जी की सेवा करते, दुःख संकट उनका हर लेते। भूत पिशाच चित्र बैताला, सबको है बन्धन में डाला। जय हनुमान के सेवक नामी, मनोकामना पूरक स्वामी
भौतिक जग की सारी पीड़ा, हरते करते करते क्रीड़ा। कठिन काज हैं जग के जेते, तव प्रताप पूरण हो तेते ॥ भूतपति अति विकट कराला, संकट हरण जय दीन दयाला श्रद्धा भक्ति से सिमरन करते, उनके सभी कष्ट तुम हरते ।।
तन मन धन समर्पित जो करते, कठिनाई सब उनकी हरते। तेरे सिवा कौन प्रभु मेरा, केवल एक आसरा तेरा ॥ अरज लिए खड़ा दरबार, प्रभु करो मेरा उद्धार श्वेत ध्वजा उड़ रही गगन में, नाँचू देख मगन हो मन में ॥
मेरों सेर गाँव प्रभु नौका ठिकाना बना अब वहाँ बली का। प्रातः काल स्नान करावे, तेल और सिन्दूर लगाये || श्वेत पुष्प माला पहिनावे, इत्र और चन्दन छिड़कावे । ज्योति जला आरती उतारे, जयति जय श्री प्रेत पुकारे ||
उनके कष्ट हरे बलवान, जयति जय श्री प्रेत महान महिमा सब जाने प्रभु तेरी, कष्ट हरें करें न देरी ।। इच्छा पूर्ण करते जन को, राजा हो या रंक सभी की। तप तेज आपका अपार, जिसको जाने सब संसार ।
दुष्टजनों को देते दण्ड, तोड़ते उनके सब पाखण्ड। चरणों में जो अरजी लगावे, सकल कष्ट उसके मिट जावे ।। आपके दूत बड़े बलवान, पकड़े नित्य नए शैतान। • गुस्सा प्रेतराज जब खावें, उत्पाती सब पकड़े जावें ।।
पलटन है बलवान तुम्हारी, जिससे काँपे भूमि सारी। धर्म की तुम राह चलाते, जिन और भूतों को भगाते ॥ भक्त कष्ट हर शत्रुहन्ता, जय जय प्रेत राज बलवन्ता। जयति जय श्री प्रेत बलधामा, भक्त कष्ट हर पूर्ण कामा॥
भक्त शिरोमणि वीर प्रचंडा, दुष्ट दलन करते निज दण्डा। जयति जय श्री प्रेत बलवाना, महिमा अमित तेरी बलधामा ॥ जो यह पढ़े श्री प्रेत चालीसा, दुख न रहे ताको लव लेसा।। कहे यह दास ध्यान धर तेरा, नित ही मन में करो बसेरा ॥
दोहा
अरि दलन जग पाप हर, मंगल करुणावान। जयति जय भक्त रक्षक, प्रबल प्रेतराज बलवान ।।
दोहा
पहले सुमिर गणेश, को फिर बाला जी ध्यान। भैरव चालीसा कहू, कृपा करे बलवान ||
चौपाई
जयति जय भैरव बाबा, तेजवान गुणधारी। काली के लाला हो तुम, जय जय जय बलधारी 11 घोर अघोर नाम तुम्हारे, अश्वनाथ कहलाओ। कहीं भैरव कहीं बटुक कहाते, कहीं काल बन जाओ ॥
उज्जैन में महाकाल बन, मदिरा पीते जाते हो कहीं भैरव भीषण हो, भीम कपाल हो जाते हो क्रोधी तेजवन्त, भुजंगी हाली हो दया सदा भक्तों पर करते, दीनन के प्रतिपाली हो ॥
पिशाचों के प्यारे हो तुम, जन के संकट हरते हो। क्षेत्रपाल बन तुम्हीं निशि दिन, गाँव की रक्षा करते हो । शंकर के अवतार तुम्हीं हो, हा हाकार मचाते हो। भक्तों की रक्षा करते और उड़द का भोग लगाते हो
एक हाथ में खड़ग तिहारे, दूजे कर कमण्डुल धारे। तीजे कर में पारा विराजे, चौथे वर मुद्रा हे साजे || श्याम श्वान सवारी करते, दीनों के सब संकट हरते।। श्याम रूप सदा जय तेरी, निशिदिन तेरा सुमिरन करते ॥
रविवार जो पूजा करता और स्नान कराता है। धूप दीप नेवैद्य चढ़ाता, संकट से छुट जाता है ।। जय जय जय भैरव बाबा, तुम ही बनो सहाई । त्रितापों को तुम ही मिटाओ, तुम्हीं से लौ है लगाई ||
भूतनाथ के सेवक हो, तुम प्रेतराज के प्यारे । भूतों को तुम फाँसी देते, चाहे कितना ही चिक्कारे । भालचन्द्र तिलक तुम धारी, हो शंकर के प्यारे महाकाल के काल तुम्हीं, हो जीवन के रखवारे ।।
रवान सवारी पर चढ़ कर, प्रभु हा हाकार मचाओ। श्री प्रेत के साथ रमो, श्मशान में धूम मचाओ ॥ महारुद्र के अवतार तुम्ही हो, भक्तों के करतार तुम्हीं हो सृजन करते पालन करते और करते संहार तुम्हीं हो ॥
जो जन तुम्हारा सुयश गाता, सभी कष्ट मिट जाता है। जो मिश्री का भोग लगाता, वह प्रसन्नता पाता है । रूप तुम्हारा अजब अनोखा, दुष्ट जनों को देते धोखा । भक्त जनों के काम बनाते, खाते नहीं कहीं हो धोखा ।।
काली के लाला तुम प्यारे सुन्दर सुन्दर नैन तुम्हारे । बाला जी के सेवक हो तुम, संकट काटो सभी हमारे ॥ नमो नमामि काशी वासी, तुम्हीं से सुख है मिलता। नमो नमामि हे भयहारी, तुम्हीं से ज्ञान है मिलता ॥
सभी आडम्बर दूर करो, हे पाखण्डों के नाशी। सभी दुष्टों का नाश करो, हे काशी के वासी। जय जय भैरव वर दो हमको, वरदायक करतार तुम्हीं। नमो नमामि भैरव बाबा, हम सेवक भरतार तुम्हीं ॥
दोहा
भैरव बाबा दुःख हरण, संकट नाश करन जय जय तुम्हारी जय हो, रहूँ तुम्हीं में मगन
सुनो जी भैरव वीर, हे रणधीर, यह विनती करूँ। भिक्षा मुझे यह चाहिए, मैं द्वार नित आया करूँ ।
अरजी मेरी सरकार, करूणागार, तुम सुन लीजिए। न भक्ति है, न ज्ञान है, बस मदद थोड़ी कीजिये महिमा तुम्हारी बहुत है कैसे मैं वर्णन करूँ। सुनो जी भैरव वीर, हे रणधीर, यह विनती करूँ। भिक्षा मुझे यह चाहिए, मैं द्वार नित आया करूँ
शोभा बढ़ाए धाम की, सब ओर जय जय कार है। भूत प्रेत व जिन्नादि सब पे तेरा राज है। हथियार हैं जो आपके, उनका क्या वर्णन करूँ । सुनो जी भैरव वीर, हे रणधीर, यह विनती करूँ । भिक्षा मुझे यह चाहिए, मैं द्वार नित आया करूँ
एक हाथ में खड़ग, दूजे, पारा धारे हो सदा । तीजे कमण्डुल हैं उठाया, चौथे वर मुद्रा सदा । तुम गुणों से दूर हो तारीफ फिर मैं क्या करूँ 1 सुनो जी भैरव वीर, हे रणधीर, यह विनती करूँ । भिक्षा मुझे यह चाहिए, मैं द्वार नित आया करूँ।
बहुत है महिमा तुम्हारी भैरों सेर अब धाम है। आते दुखी पीड़ित जहाँ जग में ऊँचा नाम है। श्री भैरव सरकार के में शीश चरणों में धरूँ । सुनो जी भैरव वीर, हे रणधीर, यह विनती करूँ भिक्षा मुझे यह चाहिए, मैं द्वार नित आया करूँ।
नित नये तुम खेल खेलो माता जी खुश होती रहें। सिर पर मेरे अब हाथ रख दो मन बहुत व्याकुल रहे। हाथ जोड़ कर विनती करूँ और शीश चरणों में धरूँ। सुनो जी भैरव वीर, हे रणधीर, यह विनती करूँ । भिक्षा मुझे यह चाहिए, मैं द्वार नित आया करूँ ।
जय प्रेतराज धिराज राजा कृपा इतनी कीजिये हम द्वार तुम्हारे आ पड़े, हे नाथ शरण में लीजिये। सुनलो विनय सरकार, करूणागार, भगवन् दुःख हरी। संकट सताते नित प्रभु, ह नाथ, अब संकट हरी। जय प्रेतराज धिराज राजा कृपा इतनी कीजिये। हम द्वार तुम्हारे आ पड़े, हे नाथ शरण में लीजिये।
सिर पर सुहाना मुकुट, गल धारे मणिमाल है। रूप लुभावन जगत मोहक, काटत संकट जाल है। जब काल बन, विकराल बन दुष्टों पे फेंकत जाल है। तब जिन्नादि कैद होते होते सब बेहाल हैं। – जय प्रेतराज धिराज राजा कृपा इतनी कीजिये हम द्वार तुम्हारे आ पड़े, हे नाथ शरण में लीजिये ।
तुम वीर हो, रणधीर हो, प्रभु सकल सुख के धाम हो । दुष्टों के मारणहार तुम, संकट हरण घनश्याम हो । न बुद्धि है, न ज्ञान है, प्रभु हम हैं अधमाधम निरें । अज्ञान का स्वामी नाश कर दो, चरणों में हैं आ गिरे। जय प्रेतराज धिराज राजा कृपा इतनी कीजिये । हम द्वार तुम्हारे आ पड़े, हे नाथ शरण में लीजिये ।
सुयश स्वामी विश्वव्यापक, श्री भैरों सेर अब धाम है। हम हैं मनोरथ लेकर आये, आप पूर्ण काम हैं। लीला निराली आपकी महिमा तो अपरम्पार है। जो ध्यान तुम्हारा धरते हैं बस उनका बेड़ा पार है। जय प्रेतराज धिराज राजा कृपा इतनी कीजिये हम द्वार तुम्हारे आ पड़े, हे नाथ शरण में लीजिये
जो चित्त चरणों में लगाता और स्नान कराता है। ध्यान धरता दूध चढ़ाता संकट से छुट जाता है। उसकी इच्छा पूरी करते दुःख सभी हर लेते हो । कष्टों से छुटकारा होता सुख व सम्पति देते हो । जय प्रेतराज धिराज राजा कृपा इतनी कीजिये | हम द्वार तुम्हारे आ पड़े, हे नाथ शरण में लीजिये।
पूरी करो इच्छा सभी, हे नाथ करुणागार हो । दरबार में हाजिर तुम्हारे, अब तो बेड़ा पार हो । कब से प्रभु हम हैं पड़े हे नाथ दर्शन दीजिये । द्वारे तुम्हारे हैं खड़े हे नाथ शरण में लीजिये । जय प्रेतराज धिराज राजा कृपा इतनी कीजिये । हम द्वार तुम्हारे आ पड़े, हे नाथ शरण में लीजिये ।
नमामी शमीशान निर्वाणरूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपम्, निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं ॥ 1 ॥
निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं, गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं करालं महाकाल कालं कृपालं, गुणागार संसार पारं नतोऽहं ॥ 2 ॥
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं, मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं, स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारूगंगा, लसद्भाल बालेन्दु कंठे भुजंगा ॥ 3 ॥
चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं, प्रसन्नाननं नील कंठं दयालं, मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं, प्रिय शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥ 4 ॥
प्रचंड प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं, अखण्डं अजं भानुकोटि प्रकाशं, त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं, भजेऽहंभवानीपतिं भावगम्यं ॥ 5 ॥
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी, सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी, चिदानंद संदोह मोहापहारी, प्रसीद प्रसीद प्रभोमन्मथारी ॥ 6 ॥
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं, भंजतीह लोके परे वा नराणाम्, न तावत्सुखं शान्ति सन्ताप नाशं, प्रसीद प्रभोसर्वभूताधिवासं ॥ 7 ॥
न जानामि योगं जपं नैवपूजां, नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं, जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं, प्रभोपाहि आपन्नमामीश शंभो ॥ 8 ॥
श्लोक
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हर तोषये, ये पठन्ति नराभक्म्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ।।
ॐ ॐ ॐ
श्री गणेशाय नमः
श्री गुरुवे नमः
गुरू ब्रह्मा गुरु विष्णुः गुरू र्देवो महेश्वरः । गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ।।
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः ॥
नमस्ते भगवते भृगुदेवाय वेधसे । देव देव नमस्तुते भूत भावन पूर्वजः ॥
यस्यांके च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट ।
सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवर: सर्वाधिपः सर्वदा शर्व सर्वगतः शिवः शशिनिभ: श्रीशंकरः पातु माम् ।।
प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मंञ्जुलमंगलप्रदा।।
नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम् पाणौ महासायकचारूचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम् ।।
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं, दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् | सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं, रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ।।
छ- मामभिरक्षय रघुकुल नायक धृत बर चाप रुचिर कर सायक ।।
मोह महा घन पटल प्रभंजन । संसय बिपिन अनल सुर रंजन ||
अगुन सगुन गुन मंदिर सुंदर । भ्रम तम प्रबल प्रताप दिवाकर ||
काम क्रोध मद गज पंचानन । बसहु निरंतर जन मन कानन ॥
बिषय मनोरथ पुंज कंज बन । प्रबल तुषार उदार पार मन ||
भव बारिधि मंदर परमं दर । बारय तारय संसृति दुस्तर ।।
स्याम गात राजीव बिलोचन । दीन बंधु प्रनतारति मोचन ||
अनुज जानकी सहित निरंतर । बसहु राम नृप मम उर अंतर ॥
मुनि रंजन महि मंडल मंडन । तुलसिदास प्रभु त्रास बिखंडन ||
गुरुदेव सुनो, मैं पड़ा यहां, सिर रखे तुम्हारे चरणों में, इनका ही सहारा रखना सदा, रहूं पड़ा तुम्हारे चरणों में ।
संसार भवर की माफिक है, कहीं डूब न जाऊं बल देना, जब नैया डोल उठे मेरी, तब तू ही मुझे संबल देना ।
औरों के बहुत सहारे हैं । पर मेरा सहारा कोई नहीं, औरों के गुजारे और भी हैं, पर मेरा गुजारा और नहीं ।
आँखें न तरसने लगे कभी, गुरूदेव तुम्हारे दरसन को, मन में सूरत रखना अपनी, दिल मेरा तेरा दरपन हो ।
अनजाने में अपराध बने, तुम क्षमा भाव अपना लेना, अनजान जान कर सेवक को, चरणों में अपनी जगह देना ।
जय-जय गणनायक-हृदय विधायक-एक दन्त महाकाय,
जय सृष्टि विधाय-मंगलदाय-सिद्धि बुद्धि प्रदाय,
जय परसुधारी-चन्द्र विहारी-विघ्नकारी भय हारी,
जय-जय असुरारी अजिर विहारी मंगलमय भवतारी,
जय शुद्ध स्वरूपा-हस्तिरूपा-गजवदना दुखहारी,
जय मंगलकरणा-संकट हरणा-दीनबन्धु असुरारी,
जय करूणा कंजा-सब दुःख भंजा-मोदक प्रिय सुरत्राता,
जय गिरिजानन्दन हे सुखकन्दन-सब जन हृदय विधाता,
जय मूषिक वाहन जय चतुरानन जय प्रिय गिरिजा ईसा,
जय वक्रातुण्डा-दीर्घा सुण्डा-जय-जय-जय गज वेषा,
प्रथम पूज्य जय-देव पूज्य जय-जयजय मंगलरूपा,
सब सिद्धि दाता भाग्य विधाता जय-जय-जय गजरूपा,
मंगल करणा भव से तरणा शरण पड़े प्रभु तेरी,
भगवन् आओ दया दिखाओ करो न कुछ अब देरी,
गजानना हे गजवदना-मंगल मूरति रूप,
दया करो हे हृदय विहारी-जन नायक सुर भूप।

ॐ विकटाननाय नमः श्री रामाय नमः श्री हनुमते नमः
जीवन में अकसर सुबह से रात तक काम ही काम में उलझा इंसान तन और मन से थक कर अशांत हो जाता है। उस विश्रान्ति को नष्ट करने के लिए वह भिन्न भिन्न मनोरंजनों की तलाश में रहता है। मनचाहे मनोरंजन से वह चाहे अल्पकाल के लिए ही हो, अपने मन की थकान को दूर कर निद्रा में चला जाता है। फिर सुबह उसी परम्परा में चलकर अपने दिनों को लगभग इसी प्रकार से बिताता है।
हम भारतीय भाग्यवान है – कि कालान्तर में ऋषियों मुनियों व देवों ने मानवों की इस अशांति को समझा और उसे दूर करने के लिए विभिन्न पर्वों का निर्माण कर दिया, ताकि मानव मात्र उस पर्व के दिन उल्लासमय होकर विश्रान्ति को नष्ट कर उल्लसित हो सके व धर्म मार्ग पर चलते हुए जीवन में उन्नतिशील भी हो सके।
वासान्तिक नवरात्र हों, शारदीय नवरात्र हों या रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, दशहरा, दिवाली आदि पर्व हों – जिनमें देव पूजा आराधना करते हुए मानव मन विश्रान्ति से दूर चला जाता है। प्रदेशों में मनाये जाने वाले अनेक विभिन्न पर्व, मेले, नृत्य, संगीत आदि का समायोजन मानव मन को शान्ति प्रदान करते हैं। इन पर्वों मेलों आदि के पीछे चाहे कोई भी कथा प्रसंग हो वह सब अनुशंसनीय ही है। ऐसा ही एक महापर्व है वसन्तोत्सव (होली) जिसमें भिन्न-भिन्न रंगों से होली खेलते प्राणी एक दूसरे को रंगो से ऐसा रंगीन बना देते है कि उसका चेहरा बेतुका और वैभवहीन हो जाता है, जिससे उसकी पहचान भी कठिन हो जाती है।
यह पर्व कब से मनाया जा रहा है – चाहे इसका ठीक-ठीक वर्णन कहीं भी प्राप्त नहीं है – पर इसके पीछे की कथा को होलिका दहन के साथ जोड़ दिया गया है।
सदियों से यह रंगों का त्योहार अति वैभव पूर्ण व उल्लासमय रूप में मनाया जाता रहा पर अब इसमें कई प्रकार की कुरीतियों का समावेश होता जा रहा है – रंगों की मार अभद्र हो गई है, बनावटी कैमिकल से बने रंग इस त्योहार का वैभव लुप्त करते जा रहे हैं।
कहाँ तो जड़ी बूटियों, फूलों से बने अबीर गुलाल कुमकुम आदि रंग जो चेहरों को चमका जाते थे। कहाँ सत्यानाशी बनावटी रंग जो आदमी का हुलिया ही बिगाड़ जाते हैं। इस एक कारण से भी प्राणियों का एक वर्ग इस उल्लासमय पर्व से दूर रहकर कलान्त हृदय किसी एकान्त स्थान में अपना यह दिवस व्यतीत करने पर मजबूर सा हो गया है।
अब घिसी पिटी परम्परा को तिलांजलि दे, श्री त्रिमूर्तिधाम पंचतीर्थ में यह त्योहार देवों की सन्निधी में उल्लास के साथ विभिन्न फूलों की वर्षा करते हुए – इत्र आदि की सुगन्ध विखेरेते हुए – भजन, कीर्तन, संगीत का समायोजन करते हुए मनाया जाता है – उपरान्त सुन्दर व्यजनों का रसास्वादन इसमें और भी पूर्णता भर देता है।
वसंतोत्सव (होली) के सुन्दर त्योहार को मार्च 10, 2020 भौमवार (मंगलवार ) को निम्न कार्यक्रमानुसार उल्लास से मनायें।
| क्रमांक | दिन | पूर्णिमा |
|---|---|---|
| 1. | शुक्रवार 01-05-2026 | सत्यनारायण व्रत, पूर्णिमा व्रत |
| 2. | रविवार 31-05-2026 | पूर्णिमा व्रत |
| 3. | सोमवार 29-06-2026 | सत्यनारायण व्रत, पूर्णिमा व्रत - वट सावित्री व्रत |
| 4. | बुधवार 29-07-2026 | सत्यनारायण व्रत, पूर्णिमा व्रत |
| 5. | शुक्रवार 28-08-2026 | पूर्णिमा व्रत |
| 6. | शनिवार 26-09-2026 | सत्यनारायण व्रत, पूर्णिमा व्रत, श्री महा लक्ष्मी व्रत (19-09-2026 से 03-10-2026) |
| 7. | रविवार 25-10-2026 | सत्यनारायण व्रत, शरद पूर्णिमा व्रत, कोजागर व्रत |
| 8. | मंगलवार 24-11-2026 | सत्यनारायण व्रत, कार्तिक पूर्णिमा व्रत |
| 9. | बुधवार 23-12-2026 | सत्यनारायण व्रत, पूर्णिमा व्रत |
| 10. | शुक्रवार 22-01-2027 | सत्यनारायण व्रत, पौष पूर्णिमा व्रत |
| 11. | शनिवार 20-02-2027 | सत्यनारायण व्रत, माघ पूर्णिमा व्रत |
| 12. | सोमवार 22-03-2027 | पूर्णिमा व्रत |
| क्रमांक | दिन | मासिक काल अष्टमी व्रत |
|---|---|---|
| 1. | शनिवार 09-05-2026 | मासिक काल अष्टमी व्रत |
| 2. | सोमवार 08-06-2026 | मासिक काल अष्टमी व्रत |
| 3. | मंगलवार 07-07-2026 | मासिक काल अष्टमी व्रत |
| 4. | वीरवार 06-08-2026 | मासिक काल अष्टमी व्रत |
| 5. | शुक्रवार 04-09-2026 | श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत, मासिक काल अष्टमी व्रत |
| 6. | शनिवार 03-10-2026 | मासिक काल अष्टमी व्रत, श्री महा लक्ष्मी व्रत समाप्त (19-09-2026 से 03-10-2026) |
| 7. | रविवार 01-11-2026 | मासिक काल अष्टमी व्रत |
| 8. | मंगलवार 01-12-2026 | मासिक काल अष्टमी व्रत |
| 9. | बुधवार 30-12-2026 | मासिक काल अष्टमी व्रत |
| 10. | शुक्रवार 29-01-2027 | मासिक काल अष्टमी व्रत |
| 11. | रविवार 28-02-2027 | मासिक काल अष्टमी व्रत |
| 12. | मंगलवार 30-03-2027 | मासिक काल अष्टमी व्रत |
| क्रमांक | दिन | मासिक श्री दुर्गाअष्टमी व्रत |
|---|---|---|
| 1. | शुक्रवार 24-04-2026 | मासिक श्री दुर्गा अष्टमी व्रत |
| 2. | शनिवार 23-05-2026 | मासिक श्री दुर्गा अष्टमी व्रत |
| 3. | सोमवार 22-06-2026 | मासिक श्री दुर्गा अष्टमी व्रत |
| 4. | मंगलवार 21-07-2026 | मासिक श्री दुर्गा अष्टमी व्रत |
| 5. | वीरवार 20-08-2026 | मासिक श्री दुर्गा अष्टमी व्रत |
| 6. | शनिवार 19-09-2026 | अदुःखा नवमी व्रत, मासिक श्री दुर्गा अष्टमी व्रत, श्री महा लक्ष्मी व्रत प्रारम्भ (19-09-2026 से 03-10-2026) |
| 7. | सोमवार 19-10-2026 | मासिक श्री दुर्गा अष्टमी व्रत, श्री महानवमी नवरात्र व्रत |
| 8. | मंगलवार 17-11-2026 | मासिक श्री दुर्गा अष्टमी व्रत |
| 9. | वीरवार 17-12-2026 | मासिक श्री दुर्गा अष्टमी व्रत |
| 10. | शनिवार 16-01-2027 | मासिक श्री दुर्गा अष्टमी व्रत |
| 11. | रविवार 14-02-2027 | मासिक श्री दुर्गा अष्टमी व्रत |
| 12. | मंगलवार 16-03-2027 | मासिक श्री दुर्गा अष्टमी व्रत |